
रांची. झारखंड में विकास की रफ़्तार पर विभागीय अधिकारियों की सुस्ती हावी है। विकास योजनाओ में खर्च के नाम पर वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में एक प्रतिशत से भी कम खर्च हुआ है। अब पहली तिमाही ख़त्म होने में तीन दिन ही बचे है, मगर विकास योजनाओं के लिए निर्धारित योजना बजट का केवल 0.89 प्रतिशत ही अधिकारी खर्च कर पाए है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल बजट का भी 4.89 प्रतिशत ही खर्च हुआ है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य का कुल बजट 1,58,560 करोड़ रुपये है, जिसमें योजना मद के लिए 1,00,891 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
विभागों की सुस्ती पर वित्त मंत्री ने जताया असंतोष
विभागों की सुस्ती पर राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने असंतोष जताते हुए विभागों को खर्च में तेजी लाने का निर्देश दिया है। इसके लिए वे जल्द ही सभी विभागीय सचिवों को पत्र भी भेजेंगे। वित्त मंत्री ने कहा कि प्रथम तिमाही में 12 से 15 फीसदी बजट राशि खर्च होनी चाहिए थी। खर्च काफी कम होना असंतोषजनक है।
क्या होता है योजना बजट?
किसी भी सरकार का बजट मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा होता है। पहला स्थापना व्यय, इसमें सरकारी कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, दफ्तरों का रखरखाव, बिजली बिल और प्रशासनिक खर्चे आते हैं। यह खर्च अनिवार्य होता है और इसे टाला नहीं जा सकता। कर्मचारी काम करें या योजनाओं की रफ्तार धीमी हो, सैलरी समय पर देनी ही पड़ती है। दूसरा योजना बजट, यह वह पैसा है जो विकास कार्यों, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और जन कल्याणकारी योजनाओं पर सीधा खर्च होता है। राज्य में विकास योजनाओं के लिए निर्धारित 1,00,891 करोड़ के योजना बजट में से केवल 0.89% यानी लगभग 898 करोड़ ही खर्च हुए हैं। इसका सीधा मतलब यही है कि शुरुआती महीनों में विकास की योजनाएं फाइलों और स्वीकृतियोंमें ही अटकी रहीं, लेकिन सरकारी बाबुओ की सैलरी, भत्ते और प्रशासनिक खर्चे हमेशा की तरह समय पर निकाल लिए गए। यही वजह है कि योजना बजट का खर्च 1% भी नहीं पहुंच पाया।



