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MMDR संशोधन अधिनियम को रघुवर दास ने राज्य और राष्ट्रहित में बताया, झामुमो और कांग्रेस पर भ्रम फैलाने का लगाया आरोप, झामुमो का पलटवार, कहा – खनिज हमारा, तो लाभ में पहला अधिकार भी झारखण्ड को मिले..

छात्रों और युवाओं के साथ सात साल से छल कर रही सरकार, मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए MMDR पर झूठा आंदोलन खड़ा करने की कवायद - रघुवर दास

रांची. पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि भारत सरकार द्वारा हाल ही में लाए गए MMDR (खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन बिल, 2026) अधिनियम राज्य हित और राष्ट्र हित में है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस इसकी गलत व्याख्या कर राज्य की जनता के बीच भ्रम फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे डंके की चोट पर कह रहे हैं कि यह संशोधन झारखंड के हितों के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह हमारे झारखंड को उसकी खनिज संपदा का अधिकतम लाभ दिलाने और लीगल माइनिंग को पारदर्शी बनाने के पक्ष में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है। रघुवर दास आज पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता को संबोधित कर रहे थे।

रघुवर दास ने कहा कि झामुमो-कांग्रेस के संरक्षण में धनबाद, बोकारो, चतरा, हजारीबाग, साहेबगंज, दुमका, शिकारीपाड़ा में कोयला, बालू, पत्थर सिंडिकेट लूट मचा रहा है। संथाल के एक मंत्री इसी पत्थर-बालू की दलाली और कमीशनखोरी के चक्कर में जेल जा चुके हैं। झारखंड को लुटखंड में तब्दील करने वाले JMM, कांग्रेस जैस दलों से इस अधिनियम पर कोई सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।

रघुवर दास ने कहा कि आज सवाल केवल 11,000 करोड़ रुपये के उपकर (सेस) का नहीं है। असल सवाल यह है कि क्या हम ‘वित्तीय अनिश्चितता’ का माहौल बनाकर राज्य में आने वाले बड़े निवेश, अधिक उत्पादन, रोजगार और औद्योगिक क्रांति का रास्ता रोक दें? माइनिंग सेक्टर के कुल टैक्स और वैधानिक भुगतान का लगभग 90% हिस्सा सीधे राज्यों को ही मिलता है, और यह व्यवस्था आगे भी बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी। देश में पहली बार 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ही रॉयल्टी के अलावा खनन प्रभावित जिलों के विकास के लिए ‘डीएमएफटी’ के माध्यम से 30 प्रतिशत अतिरिक्त राशि देने की व्यवस्था लागू की थी। साथ ही हम यह भी मानते रहे हैं कि जनजाति समाज, डीएमएफटी और राज्य की वैध आय की पर्याप्त सुरक्षा होनी चाहिए। खनिज संपदा का वास्तविक लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचना चाहिए।

30 कोल ब्लॉक में से केवल 23 ही चालू, क्या यही है राज्य सरकार की चिंता? – रघुवर दास

श्री दास ने कहा कि झारखंड सरकार राज्य के राजस्व के लिए कितनी चिंतित है यह इससे साबित होता है कि भारत सरकार द्वारा राज्य में 34 कोल ब्लॉक को चालू करने की मंजूरी मिलने के बाद भी अब तक केवल चार कोल ब्लॉक चालू हो पाये हैं। 30 कोल ब्लॉक को राज्य सरकार ने चालू नहीं कराया है। इसी तरह लौह अयस्क की 15 में से छह माइंस, बॉक्साइट की 37 में से 17 माइंस ही चालू है। ये ब्लॉक और माइंस चालू होते तो राज्य को बहुत बड़ा राजस्व मिलता।

रघुवर दास ने कहा कि झामुमो-कांग्रेस की सरकार 11,000 करोड़ रुपये के सेस (CESS) का रोना रोती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस सरकार की नीयत में कितना खोट है। अन्य राज्यों से तुलना एवं DMFT की स्थिति समान खनिज भंडार होने के बावजूद, ओडिशा वित्तीय वर्ष 2025-26 में 60,000 करोड़ राजस्व का लक्ष्य हासिल कर रहा है, जबकि झारखंड का लक्ष्य केवल 18,844 करोड़ है। ओडिशा की त्वरित नीलामी और खदान संचालन प्रक्रिया के कारण उसकी राजस्व दक्षता झारखंड से 3 गुना अधिक है। इसके अलावा, DMFT के कुल संग्रह (18,250 करोड़) में से 7,915 करोड़ से अधिक की राशि बिना खर्च पड़ी है और 2,487 प्रोजेक्ट्स ठप्प हो चुके हैं।

रघुवर दास ने कहा कि खनन से प्रभावित हमारे जिलों का हाल देखिए, धनबाद में 2,393.58 करोड़ रुपये, चाईबासा में 1,802.82 करोड़, चतरा में 1,055.40 करोड़, पाकुड़ में 527.88 करोड़ और रामगढ़ में 518.82 करोड़ रुपये का डीएमएफटी फंड खर्च ही नहीं किया गया।

झामुमो बोली – झारखंडी अपना वाजिब हक माँग रहे हैं, तो इतनी तकलीफ़ क्यों ?

रघुवर दास के बयान पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने अपने एक्स हैंडल में लिखा – ऐसी ही बाहरी – झारखंड विरोधी सोच के कारण झारखंडियों ने आपको (रघुवर दास) आपके विधान सभा क्षेत्र से भी जीतने नहीं दिया। झारखंड के खनिज पर ज्ञान देने से पहले थोड़ा झारखंड का दर्द भी समझिए। आपको 11 हजार करोड़ की रॉयल्टी दिखाई देती है, हमें वे गांव दिखाई देते हैं जिनकी जमीन गई, जंगल उजड़े और पीढ़ियां विस्थापन झेलती रहीं।

जेएमएम ने लिखा – सवाल यह नहीं कि खदान कितनी जल्दी खुलेगी। सवाल यह है कि खनिज निकलेगा तो झारखंडी के हिस्से में क्या आएगा? दशकों से कोयला और लोहा झारखंड से निकला, देश और कंपनियां समृद्ध हुईं – लेकिन खदान के ठीक बगल का गांव आज भी गरीबी, पिछड़ेपन से क्यों लड़ रहा है? इसी को तो संसाधनों का अभिशाप कहते हैं – जिस धरती के नीचे सबसे ज्यादा दौलत हो, उसी धरती के लोग सबसे ज्यादा वंचित रहें। झारखंड को खनिज की लूट नहीं चाहिए। खनिज से न्याय चाहिए और जब हम झारखंडी अपना वाजिब हक माँग रहे हैं तो आपको इतनी तकलीफ़ क्यों ?

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